Friday, 6 April 2012

'दिन भर रहती हूँ उलझी बिखरी सी' - वंदना





दिन भर रहती हूँ उलझी बिखरी सी,

शाम आते ही संवर जाती हूँ...!

रात लाती है तेरी याद का जादू और...मैं जी जाती हूँ... मर जाती हूँ!

तू रोज़ अपनी यादों से, इक आरजू जगाता है, ... ...

मैं रोज़ इसी आहट में, मर-मर के जीती जाती हूँ !

ये तेरी याद की रहगुज़र ही तो है,

जिस पे चलकर, गुज़रे लम्हों पे मुस्कुराती हूँ!

ज़िन्दगी के स्याह-स्याह दामन पर,

मुस्कुराहटों की चांदनी लुटाती हूँ..........!



-वंदना

No comments:

Post a Comment