मैं हूँ जवांसा....!
सर पर धूप की गठरी रखे-
सूर्य की दहकती शलाकाओं से
डरता नही... ज़रा सा-
मैं हूँ जवांसा....!
एक पाँव पर खड़ा
शांत निर्विकार, अडिग
चाहे ग्रीष्म की बरसती हो आग-
या शाम का कुहासा,
मैं हूँ जवांसा....!
मेरे हरित परिधान में
उसने टाँके हैं...
पोर पोर कांटे
मेरे दंश कभी किसी ने न बांटे-
मैं कभी न घबराया ज़रा सा-
मैं हूँ जवांसा....!
मेरी टहनियों पर
झूलते हैं, नन्हे नन्हे
फूल गुलाबी
उम्र के नशे में रहते चूर-
ज्यों शराबी!
मैं क्षण में घुलता नही
पानी में ज्यों बताशा...
मैं हूँ जवासा...!
-मनोरमा पांडेय 'मनो'
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