Friday, 6 April 2012

मैं हूँ जवांसा..! - मनोरमा पांडेय 'मनो'



मैं हूँ जवांसा....!

सर पर धूप की गठरी रखे-

सूर्य की दहकती शलाकाओं से

डरता नही... ज़रा सा-

मैं हूँ जवांसा....!

एक पाँव पर खड़ा

शांत निर्विकार, अडिग

चाहे ग्रीष्म की बरसती हो आग-

या शाम का कुहासा,

मैं हूँ जवांसा....!

मेरे हरित परिधान में

उसने टाँके हैं...

पोर पोर कांटे

मेरे दंश कभी किसी ने न बांटे-

मैं कभी न घबराया ज़रा सा-

मैं हूँ जवांसा....!

मेरी टहनियों पर

झूलते हैं, नन्हे नन्हे

फूल गुलाबी

उम्र के नशे में रहते चूर-

ज्यों शराबी!

मैं क्षण में घुलता नही

पानी में ज्यों बताशा...

मैं हूँ जवासा...!


-मनोरमा पांडेय 'मनो'

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